ॐ श्री सद्गुरवे नमः
राँची िजला संतमत सत्संग समत के तत्वावधान में महष मेंहीँ आश्रम, चु टया में चल रहे "पक्ष ध्यान-साधना शवर" के नौवें दन रामचरत मानस में वणत नवधा भिक्त पर वस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया। सत्संग के कायक्रम में संतमत के राष्ट्रीय प्रवचन कता पूज्य डॉ० स्वामी नमलानंद जी महाराज ने कहा क ईश्वर की भिक्त मुिक्त की सीढ़ी है। मयादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम ने माता शबरी को उपदेश करते हुए कहा है क संतो का संग अथात सत्संग भिक्त की पहली सीढ़ी है। ईश्वर वषयक कथा प्रसंगों को प्रेम पूवक श्रवण करना भिक्त की दूसरी सीढ़ी है। सत्संग में आकर ही मानव गुरु की खोज करता है और सच्चे संत सदगुरु का सानध्य पाकर मान रहत रहकर उनके आदेश परवेश में रहना भिक्त की तीसरी सीढ़ी है। गुरु प्रदत्त मंत्र का जप करना चौथी भिक्त है िजसका वणन वेद में भी है। ये सब भिक्त स्थूल भिक्त कहलाती है। इसके आगे की भिक्त सूक्ष्म भिक्त कहलाती है- िजसके अंतगत दृिष्ट योग की क्रया आती है। भिक्त की पराकाष्ठा सूरत शब्द योग की साधना है। इन्हीं सब क्रयाओं को करने की प्रेरणा संतमत सत्संग में दी जाती है िजसे करके मानव मुिक्त को प्राप्त करता है अथात आवागमन के चक्र से सदा के लए छूट जाता है और जीव पीव में मलकर शाश्वत सुख को प्राप्त करता है। पूज्य स्वामी श्यामानंद जी महाराज ने भिक्त में गुरु की महत्ता पर संक्षप्त रूप से प्रकाश डाला। पूज्य स्वामी बालकृष्ण जी महाराज ने समझाया क हमें भिक्त क्यों करनी चाहए, कसकी करनी चाहए, और कैसे करनी चाहए। और इसी उद्देश्य की पूत के लए दूर दराज से सैकड़ों धमप्रेमी साधना शवर में पहु ँचकर मानवतन को सफल बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं। राँची िजला संतमत सत्संग समत के सभी सदस्य एवं पदाधकारीगण कंधे से कंधा मलाकर कायक्रम को सफल बनाने में प्रयत्नशील हैं। समत शहर के सभी धमप्रेमी जनों से नवेदन करती है क ज्यादा से ज्यादा संख्या में उपिस्थत होकर सत्संग का लाभउठावें और पुण्य के भागी बनें।







