सांस्कृतिक पाठशाला में ‘भारतीय लोकतंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका’ पर हुआ संवाद
मेदिनीनगर। इप्टा एवं प्रगतिशील लेखक संघ की पलामू इकाई के संयुक्त तत्वावधान में सांस्कृतिक पाठशाला की 106वीं कड़ी के तहत ‘भारतीय लोकतंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका’ विषय पर संवाद आयोजित किया गया। कार्यक्रम की संयुक्त अध्यक्षता प्रगतिशील लेखक संघ के जिला अध्यक्ष मृत्युंजय शर्मा एवं इप्टा के कार्यकारी अध्यक्ष सुरेश सिंह ने की।
विषय प्रवेश करते हुए प्रेम प्रकाश ने कहा कि चुनाव आयोग की भूमिका को समझने के लिए संविधान की प्रस्तावना को समझना और उसे आत्मसात करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि देश संविधान से चलता है। ऐसे में संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है।
ज्ञान-विज्ञान समिति के प्रांतीय अध्यक्ष शिवशंकर प्रसाद ने कहा कि वर्तमान समय में चुनाव आयोग की भूमिका के अवलोकन और मूल्यांकन की जरूरत है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता सरकार चुनती है, लेकिन आज ऐसी स्थिति बन रही है कि सरकार ही वोटर चुनने की कोशिश करती दिखाई दे रही है। यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है।
अधिवक्ता ओंकारनाथ तिवारी ने कहा कि चुनाव आयोग भारतीय लोकतंत्र की महत्वपूर्ण संस्था है। जाति, धर्म और ऊंच-नीच के आधार पर समाज का विभाजन लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करता है। चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित किए बिना लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता।
अच्छेलाल प्रजापति ने बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर के अंतिम भाषण का उल्लेख करते हुए कहा कि संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता लोकतंत्र के लिए जरूरी है। शिक्षक परिणत कुमार ठाकुर ने कहा कि लोकतंत्र केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक लोकतंत्र का समन्वय है। जनता को सर्वोपरि रखना ही लोकतंत्र की मूल भावना है।
शिक्षक संजय कांत ने टीएन शेषन के कार्यकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके समय में चुनाव आयोग की प्रभावी भूमिका का एहसास देश को हुआ। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग की गलतियों और कमियों को उजागर करना जरूरी है।
ललन प्रजापति ने कहा कि संविधान के मूल्यों को लेख, कहानी, फिल्म और गीतों के माध्यम से जनता तक पहुंचाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक चेतना मजबूत किए बिना संवैधानिक मूल्यों की रक्षा संभव नहीं है।
अध्यक्षीय वक्तव्य में मृत्युंजय शर्मा ने कहा कि देश में आर्थिक असमानता लगातार बढ़ी है और पूंजी का केंद्रीकरण लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती है। उन्होंने संवैधानिक संस्थाओं को सत्ता और पूंजी के प्रभाव से मुक्त रखने पर जोर दिया।
सुरेश सिंह ने कहा कि आजादी के बाद यह उम्मीद बनी थी कि अब सत्ता वंश और राजघरानों से नहीं, बल्कि जनता के मत से तय होगी। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र और संप्रभुता की रक्षा के लिए नागरिकों को अपनी भूमिका तय करनी होगी और संवैधानिक मूल्यों के पक्ष में संघर्ष करना होगा।
धन्यवाद ज्ञापन के साथ संवाद का समापन हुआ। मौके पर रविशंकर, अजीत कुमार, संजीव कुमार संजू समेत अन्य लोग मौजूद थे।







