देवघर की सड़कों पर दौड़ती इंसानियत की टोटो: किराया नहीं, दुआएं कमाते हैं देवघरिया टोटो वाले सुजीत अग्रहरि
देवघर की सड़कों पर दौड़ती इंसानियत की टोटो: किराया नहीं, दुआएं कमाते हैं देवघरिया टोटो वाले सुजीत अग्रहरि
अमित कुमार,
रांची एक्सप्रेस ब्यूरो
देवघर : इस दौर में जब हर रिश्ता मतलब और हर सफर पैसे से तौला जाता है, तब देवघर की सड़कों पर एक टोटो ऐसी भी दौड़ती है जो किराया नहीं, बल्कि दुआएं कमाती है। इस टोटो के सारथी हैं सुजीत अग्रहरि, जिन्हें लोग प्यार से "देवघरिया टोटो वाला" कहते हैं।
पिछले 03 वर्षों से सुजीत देवघर की सड़कों पर अपनी ई-रिक्शा चला रहे हैं, लेकिन उनकी पहचान उनके टोटो से नहीं, उनकी इंसानियत से है। उन्होंने एक ऐसा संकल्प लिया है जो आज के स्वार्थी युग में किसी मिसाल से कम नहीं। सुजीत सीनियर सिटीजन, बीमार-लाचार लोगों और स्कूल-कॉलेज जाने वाले छात्रों से एक रुपया भी किराया नहीं लेते।
सुबह-सुबह जब स्कूली बच्चे टोटो का इंतजार करते हैं तो सुजीत खुद आवाज देकर उन्हें बैठाते हैं। कहते हैं, "पढ़ लिख कर बड़ा आदमी बनना, किराये की चिंता मत करो।" कई गरीब छात्र तो उन्हीं के भरोसे रोज स्कूल पहुंचते हैं। वहीं अस्पताल जाने वाले बीमार बुजुर्गों के लिए वे किसी फरिश्ते से कम नहीं। टोटो पर बैठते ही वे न सिर्फ उन्हें मुफ्त ले जाते हैं, बल्कि अस्पताल तक हाथ पकड़कर पहुंचा भी देते हैं।
सुजीत की मानें तो वे खुद भी 10वीं से लेकर 12वीं तक प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हैं।
सुजीत बताते हैं कि, उन्होंने कई बार सड़क किनारे खड़े, वृद्ध, छात्र, रोगी एवं जरूरतमंद-लाचार लोगों को बहुत परेशान देखा, इसलिए मेरे मन में ऐसा करने का विचार आया।
लोग पूछते हैं कि बिना किराये के घर कैसे चलता है? सुजीत मुस्कुराते हुए कहते हैं कि बाबा बैद्यनाथ की नगरी है, यहां किसी को भूखा नहीं रहने देते। जो सक्षम लोग हैं, वे थोड़ा ज्यादा दे जाते हैं, उसी से गुजारा हो जाता है। सबसे बड़ी कमाई तो बुजुर्गों की दुआ है। जब कोई बुजुर्ग सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देता है, तो लगता है दिन भर की थकान उतर गई।
देवघर जैसे धार्मिक शहर में जहां हर कोई बाबा धाम के दर्शन को आता है, वहां सुजित की यह निःस्वार्थ सेवा बाबा की सच्ची भक्ति मानी जा रही है। उनकी टोटो पर लिखा है - "सेवा ही धर्म है"। और वे सच में इसे जी रहे हैं।
आज जब इंसानियत बाजार में बिकती नजर आती है, तब सुजीत अग्रहरि जैसे लोग याद दिलाते हैं कि अच्छाई अभी जिंदा है। देवघर की सड़कों पर दौड़ती यह टोटो एक वाहन नहीं, बल्कि चलती-फिरती इंसानियत की मिसाल है, जो बिना कुछ कहे बहुत कुछ सिखा जाती है।






