बाबानगरी के दिल की धड़कन है टावर चौक, जहां थमा है हर देवघरवासी का बचपन
बाबानगरी के दिल की धड़कन है टावर चौक, जहां थमा है हर देवघरवासी का बचपन
• सन 1940 में कोलकाता के 'सेठ हजारीमल दुधवा वाला' ने करवाया था निर्माण.
अमित कुमार,
रांची एक्सप्रेस ब्यूरो
देवघर : रात के अंधेरे में लाल-सफेद धारियों वाला यह टावर जब रोशनी में नहाता है, तो सिर्फ एक चौक नहीं, बल्कि देवघर की सैकड़ों यादें जगमगाती हैं।
टावर चौक, बाबानगरी का सबसे व्यस्त और सबसे भावनात्मक कोना है। न जाने कितने लोगों की पहली साइकिल यहीं से गुजरी, कितने इश्क की पहली नजर यहीं टकराई, और कितनी जवानी की शामें इसी घड़ी के नीचे दोस्तों के साथ कट गईं।
यह सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि देवघर का दिल है।
स्थानीय लोगों की मानें तो इस घंटाघर का निर्माण आजादी से भी पहले, अंग्रेज शासनकाल में "सन 1940 में कोलकाता के सेठ हजारीमल दुधवा वाला" ने करवाया था।
उस दौर में जब लोगों के हाथों में घड़ियां नहीं होती थीं, तो इस टावर की चारों दिशाओं में लगी घड़ियों और हर घंटे बजने वाले घंटे से ही पूरा शहर समय मिलाता था।
कहा तो यह भी जाता है कि जब बैद्यनाथ मंदिर में घड़ियां नहीं थीं, तो इसी टावर की आवाज सुनकर बाबा का श्रृंगार पूजन शुरू होता था। इसलिए इसका जुड़ाव सिर्फ शहर से नहीं, बल्कि बाबा बैद्यनाथ से भी है।
समय के साथ इस चौक का स्वरूप कई बार बदला। कभी सादा ईंट का था, आज लाल-सफेद टाइल्स, सुनहरी शिवलिंग और नंदी की आकृति के साथ इसे नया लुक दिया गया है। रात में इसके ऊपर जलती लाइटें और नीचे केसरिया वस्त्र पहने कांवरिए, सावन में इसकी पहचान हैं।
हाल के वर्षों में इसे लेकर सियासत भी खूब हुई। ट्रैफिक जाम का हवाला देकर इसे तोड़ने तक की बात कही थी, तो वहीं विपक्ष ने इसे 100 साल पुरानी ऐतिहासिक धरोहर बताकर विरोध किया था। बाद में तय हुआ कि इसे गिराया नहीं, बल्कि दिल्ली के चांदनी चौक की तर्ज पर करीब 16 करोड़ की लागत से और आधुनिक व सुंदर बनाया जाएगा।
लेकिन देवघर वालों के लिए इसका मतलब एक ही है - चाहे कितना भी बदल जाए, टावर चौक पर खड़े होकर "टावर चौक पर मिलते हैं" कहना आज भी सुकून देता है। यहां की भीड़, बगल की दुकानें, आसपास का कोना और हर शाम की चहल-पहल, यही तो असली देवघर की पहचान है।






