वॉशिंगटन/ताइपे/टोक्यो: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की 24 सितंबर 2026 को प्रस्तावित बैठक से पहले ताइवान का मुद्दा एक बार फिर अमेरिका-चीन संबंधों के केंद्र में आ गया है। एशिया में अमेरिका के कुछ सहयोगी और सुरक्षा विशेषज्ञ इस बात को लेकर चिंतित हैं कि व्यापार और आर्थिक समझौते की कोशिशों के बीच वॉशिंगटन ताइवान के प्रति अपनी नीति में कोई नरमी न दिखा दे। Reuters की 17 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, एशियाई सहयोगियों में चिंता उस समय और बढ़ी जब ट्रंप ने मई में ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री को चीन के साथ बातचीत में “बातचीत के एक साधन” के तौर पर बताया था। इससे यह सवाल उठने लगा कि क्या वॉशिंगटन भविष्य में ताइवान से जुड़े रक्षा मुद्दों को चीन के साथ व्यापक आर्थिक या व्यापारिक समझौते के हिस्से के रूप में इस्तेमाल कर सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका ने ताइवान पर अपनी आधिकारिक नीति बदल दी है। ताइवान के विदेश मंत्री लिन चिया-लुंग ने कहा है कि अमेरिकी सरकार ने बार-बार ताइवान को आश्वस्त किया है कि उसकी नीति में बदलाव नहीं हुआ है। रिपोर्टों के अनुसार, शी जिनपिंग बातचीत के दौरान ताइवान का मुद्दा उठा सकते हैं। चीन ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है, जबकि ताइवान की सरकार बीजिंग के संप्रभुता संबंधी दावे को स्वीकार नहीं करती। चीन ने ताइवान के नियंत्रण के लिए बल प्रयोग का विकल्प त्यागने की बात नहीं कही है। बैठक में ताइवान के अलावा व्यापार, निवेश, तकनीक और अन्य द्विपक्षीय मुद्दों पर भी चर्चा होने की संभावना है। ऐसे में अमेरिका की ओर से ताइवान को लेकर इस्तेमाल की जाने वाली भाषा और किसी संभावित समझौते के संकेतों पर एशियाई सहयोगियों की विशेष नजर रहेगी। ताइवान को लेकर चिंता केवल ताइपे तक सीमित नहीं है। Reuters के अनुसार, जापान के प्रधानमंत्री कार्यालय और सरकार के अधिकारी भी ट्रंप प्रशासन के साथ संपर्क बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। जापानी पक्ष चाहता है कि अमेरिका-चीन बातचीत के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर उसकी चिंताओं को भी ध्यान में रखा जाए। जापान के लिए ताइवान जलडमरूमध्य का महत्व इसलिए भी है क्योंकि क्षेत्र में किसी बड़े सैन्य तनाव का असर जापान के आसपास के समुद्री और सुरक्षा वातावरण पर पड़ सकता है। अमेरिकी अधिकारियों और सांसदों की ओर से हाल में यह संकेत दिया गया है कि ताइवान को लेकर अमेरिकी नीति में बदलाव नहीं हुआ है। अमेरिकी सीनेटर पीट रिकेट्स ने 15 सितंबर को कहा कि अमेरिका ताइवान की स्थिति को बलपूर्वक बदलने के प्रयास को स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रंप को चीन के साथ बैठक में इस मुद्दे पर मौजूदा अमेरिकी नीति के संदर्भ में बात करनी चाहिए। यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था में ताइवान को लेकर अलग-अलग स्तरों पर सुरक्षा संबंधी चिंताएं सक्रिय हैं। बीजिंग लंबे समय से ताइवान को अपने राष्ट्रीय हितों से जुड़ा प्रमुख मुद्दा बताता रहा है। चीन की सैन्य गतिविधियों और अभ्यासों ने पिछले वर्षों में ताइवान जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ाया है। चीनी रक्षा मंत्री डोंग जुन ने 16 सितंबर को बीजिंग में एक सुरक्षा सम्मेलन में देशों से उकसावे वाली गतिविधियों से बचने और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने का आह्वान किया। चीन की ओर से ताइवान को लेकर कड़े रुख के बीच अमेरिका की सैन्य और राजनीतिक भूमिका बीजिंग के साथ उसके संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है। ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री अमेरिका-चीन संबंधों में लंबे समय से विवाद का विषय रही है। दिसंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने ताइवान के लिए करीब 11 अरब डॉलर के हथियार पैकेज को मंजूरी दी थी, जिसे उस समय सबसे बड़े अमेरिकी हथियार पैकेज के रूप में रिपोर्ट किया गया था। बीजिंग अमेरिकी हथियार बिक्री का विरोध करता है, जबकि वॉशिंगटन इसे ताइवान की आत्मरक्षा क्षमता से जोड़ता है। आने वाली ट्रंप-शी बैठक से पहले हथियारों की नई बिक्री को लेकर भी नजरें बनी हुई हैं। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि चीन ने नई अमेरिकी हथियार बिक्री को लेकर कड़ा रुख अपनाया है, हालांकि ऐसी रिपोर्टों में शामिल दावों की स्वतंत्र पुष्टि सीमित है। अमेरिका के सहयोगी देशों के लिए चिंता केवल ताइवान के तत्काल मुद्दे तक सीमित नहीं है। वे यह भी देख रहे हैं कि वॉशिंगटन चीन के साथ आर्थिक संबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा प्रतिबद्धताओं के बीच किस तरह संतुलन बनाता है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका की आधिकारिक भाषा या व्यवहार में ताइवान को लेकर बड़ा बदलाव दिखाई देता है, तो इससे उसके एशियाई सहयोगियों की रणनीतिक गणनाओं पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, अमेरिकी अधिकारियों के बयानों से यह भी संकेत मिलता है कि वॉशिंगटन अपनी मौजूदा नीति को बरकरार रखने की बात कर रहा है। ताइवान की सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह अमेरिका-चीन संबंधों और ताइवान-अमेरिका संबंधों को अलग-अलग रखना चाहती है। विदेश मंत्री लिन चिया-लुंग ने कहा कि ताइवान जलडमरूमध्य में शांति और स्थिरता अमेरिका तथा व्यापक अंतरराष्ट्रीय समुदाय के हित में है। इस बीच ताइपे की नजर इस बात पर रहेगी कि 24 सितंबर की बातचीत के बाद दोनों देशों की ओर से ताइवान को लेकर किस तरह के बयान सामने आते हैं। 24 सितंबर की ट्रंप-शी बैठक ताइवान के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक हितों तथा सुरक्षा संबंधी मतभेदों के बीच संतुलन तलाशने की कोशिश हो सकती है। बैठक से पहले फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि ताइवान को लेकर दोनों नेता किस भाषा और रुख के साथ आगे बढ़ते हैं। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि बैठक में ताइवान को लेकर कोई नया समझौता या नीति परिवर्तन होगा। अमेरिकी अधिकारियों के हालिया बयानों में मौजूदा नीति जारी रहने की बात कही गई है, जबकि चीन ताइवान को अपने प्रमुख राष्ट्रीय हितों में शामिल करता रहा है। इसलिए 24 सितंबर की बैठक के वास्तविक नतीजे और उसके बाद दोनों देशों की आधिकारिक घोषणाएं ही आगे की दिशा स्पष्ट करेंगी।ताइवान को लेकर क्यों बढ़ी चिंता?
24 सितंबर की बैठक में क्या हो सकता है?
जापान भी सक्रिय
अमेरिका की मौजूदा स्थिति क्या है?
चीन के लिए ताइवान सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक
हथियारों की बिक्री भी बड़ा मुद्दा
एशिया में अमेरिकी भरोसे का सवाल
ताइवान की नजर बातचीत के नतीजे पर
आगे क्या होगा?
अमेरिका-चीन वार्ता से पहले ताइवान को लेकर बढ़ी चिंता, सहयोगी देशों की नजर ट्रंप-शी बैठक पर






