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ईरान-अमेरिका तनाव के बीच खाड़ी क्षेत्र में बढ़ा खतरा, तेल और वैश्विक बाजारों पर नजर


दुबई/वॉशिंगटन: ईरान और अमेरिका के बीच जारी सैन्य टकराव का असर अब पूरे खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दिखाई दे रहा है। हाल के दिनों में अमेरिकी ठिकानों, सैन्य परिसंपत्तियों और समुद्री मार्गों से जुड़े हमलों की कई रिपोर्टें सामने आई हैं। इसके साथ ही हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी है।

अमेरिकी ठिकानों पर ईरानी हमलों की रिपोर्ट

ईरान और अमेरिका के बीच फरवरी 2026 से चला आ रहा संघर्ष कई चरणों में खाड़ी और आसपास के क्षेत्रों तक फैल चुका है। सितंबर में भी दोनों पक्षों के बीच हमले और जवाबी कार्रवाई जारी रही। 9 सितंबर को ईरान ने जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकाने को निशाना बनाने का दावा किया था, जबकि जॉर्डन ने कहा कि उसकी वायु रक्षा ने 18 बैलिस्टिक मिसाइलों को रोक लिया। उसी घटनाक्रम में अमेरिका ने पांच ईरानी तेल टैंकरों को नष्ट करने की जानकारी दी थी।

इसके बाद खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों और ऊर्जा ढांचे की सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ गई। एक अमेरिकी रक्षा निगरानी रिपोर्ट से जुड़ी रिपोर्टिंग में कुवैत, बहरीन, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, इराक, ओमान और जॉर्डन में अमेरिकी ठिकानों पर नुकसान का उल्लेख किया गया है।

हॉर्मुज जलडमरूमध्य बना सबसे अहम केंद्र

इस पूरे संकट में हॉर्मुज जलडमरूमध्य सबसे संवेदनशील क्षेत्र बन गया है। यह फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और आगे हिंद महासागर से जोड़ता है तथा दुनिया के प्रमुख तेल और गैस परिवहन मार्गों में शामिल है।

15 सितंबर को उपलब्ध प्रारंभिक शिपिंग आंकड़ों के अनुसार हॉर्मुज से केवल चार जहाज गुजरे, जबकि एक दिन पहले यह संख्या सात और 10-दिन का औसत करीब 18 था। आवाजाही में यह गिरावट क्षेत्र में बढ़े सैन्य और समुद्री जोखिम को दर्शाती है।

ईरान ने पहले हॉर्मुज के आसपास नए प्रतिबंधित क्षेत्र और वैकल्पिक शिपिंग व्यवस्था की बात भी कही थी। इससे अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी कंपनियों के लिए मार्ग और जोखिम आकलन और महत्वपूर्ण हो गया है।

तेल की कीमतों पर सीधा असर

मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव का सबसे तत्काल असर कच्चे तेल की कीमतों पर दिखाई देता है। 9 सितंबर को ईरान-अमेरिका के बीच जहाजों को लेकर हुए हमलों के बाद ब्रेंट क्रूड पहली बार जुलाई के बाद 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चला गया था।

13 सितंबर को सऊदी अरब के ऊर्जा ढांचे और क्षेत्रीय जहाजों पर हमलों की खबरों के बाद ब्रेंट करीब 105.68 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी WTI करीब 101.39 डॉलर पर बंद हुआ।

हालांकि 17 सितंबर को तेल बाजार में कुछ नरमी दिखाई दी। ब्रेंट लगभग 104.62 डॉलर प्रति बैरल और WTI करीब 101.20 डॉलर पर कारोबार कर रहा था। इसका मतलब यह है कि बाजार में तनाव की चिंता बनी हुई है, लेकिन कीमतों पर आपूर्ति और मांग से जुड़े दूसरे कारक भी असर डाल रहे हैं।

खाड़ी देशों की ऊर्जा सुरक्षा पर दबाव

सिर्फ ईरान का तेल उत्पादन ही चिंता का विषय नहीं है। सऊदी अरब, कुवैत, कतर, बहरीन और यूएई जैसे देशों में तेल एवं गैस से जुड़ा बुनियादी ढांचा भी क्षेत्रीय तनाव की चपेट में आ सकता है।

S&P Global के अनुसार 2026 के पहले छह महीनों में मध्य-पूर्व के ऊर्जा ढांचे पर 106 हमले दर्ज किए गए थे। इनमें रिफाइनरियों, तेल-गैस उत्पादन सुविधाओं और वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं शामिल थीं।

सऊदी अरब के मामले में हाल के हमलों के बाद कुछ तेल परिवहन मार्गों पर भी असर पड़ा है। रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब ने ओमान के रास्ते अतिरिक्त कच्चे तेल की खेप भेजने की व्यवस्था की है ताकि संभावित आपूर्ति व्यवधान को कम किया जा सके।

वैश्विक बाजार क्यों चिंतित हैं?

मध्य-पूर्व का संकट केवल क्षेत्रीय सुरक्षा का मुद्दा नहीं है। यदि हॉर्मुज में जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक बाधित रहती है, तो इसका असर:

  • कच्चे तेल की वैश्विक आपूर्ति पर पड़ सकता है।
  • पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं।
  • विमान ईंधन और परिवहन लागत प्रभावित हो सकती है।
  • महंगाई पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।
  • तेल आयात करने वाले देशों के व्यापार घाटे पर असर पड़ सकता है।
  • शेयर बाजारों में जोखिम से बचने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
  • वैश्विक समुद्री बीमा और माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है।

हाल के दिनों में खाड़ी शेयर बाजारों में भी क्षेत्रीय जोखिम का असर देखा गया। 16 सितंबर को कतर का प्रमुख शेयर सूचकांक 1.4% नीचे रहा, जबकि अबू धाबी का बाजार भी कमजोर हुआ।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत दुनिया के बड़े कच्चे तेल आयातकों में है, इसलिए खाड़ी क्षेत्र में लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। तेल की कीमतों में तेज वृद्धि से पेट्रोलियम आयात बिल, रुपये पर दबाव और महंगाई प्रभावित हो सकती है।

इसके अलावा भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति का महत्वपूर्ण मार्ग है। इसलिए हॉर्मुज में जहाजों की आवाजाही में लंबे समय तक रुकावट भारतीय कंपनियों की शिपिंग लागत और ऊर्जा सुरक्षा पर असर डाल सकती है।

फिलहाल स्थिति

17 सितंबर तक उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक संघर्ष पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और हॉर्मुज तथा आसपास के समुद्री क्षेत्रों में सुरक्षा जोखिम बना हुआ है। दूसरी ओर, कूटनीतिक स्तर पर तनाव कम करने के प्रयास भी जारी हैं। चीन ने क्षेत्र में शांति और तेल आपूर्ति बहाल करने की दिशा में प्रयास किए हैं, जबकि मिस्र और ओमान भी तनाव कम कराने की कोशिशों में भूमिका निभा रहे हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 16 सितंबर को कहा कि उन्हें उम्मीद है कि युद्ध समाप्ति की दिशा में प्रगति हो सकती है। साथ ही, अमेरिकी प्रशासन और खाड़ी देशों के बीच बातचीत की संभावना भी सामने आई है।

एक नजर में

मुद्दामौजूदा स्थिति
मुख्य संघर्षअमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव
सबसे संवेदनशील क्षेत्रहॉर्मुज जलडमरूमध्य
समुद्री आवाजाहीहाल में काफी कम हुई
तेल कीमतब्रेंट 17 सितंबर को करीब $104.62
मुख्य जोखिमतेल एवं गैस आपूर्ति में व्यवधान
खाड़ी पर असरऊर्जा ढांचे और समुद्री व्यापार की सुरक्षा पर दबाव
भारत पर संभावित प्रभावआयात लागत, ईंधन कीमत और महंगाई
कूटनीतिक प्रयासतनाव कम करने की कोशिशें जारी