ए.के. सिंह कॉलेज में विज्ञान नामांकन पर रोक का मामला गरमाया, प्राचार्य ने कुलपति पर 10% कमीशन मांगने का लगाया आरोप
कृष्णा यादव, हुसैनाबाद: ए.के. सिंह कॉलेज, जपला और नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय (NPU) के बीच विज्ञान संकाय में नामांकन को लेकर चल रहा विवाद अब गंभीर आरोप-प्रत्यारोप में बदल गया है। कॉलेज के प्राचार्य डॉ. राम सुभग सिंह ने राज्यपाल, मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री को पत्र भेजकर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दिनेश कुमार सिंह पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
प्राचार्य ने आरोप लगाया है कि सत्र 2024-25 में राज्य सरकार से कॉलेज को मिले 96 लाख रुपये के अनुदान में कथित 10 प्रतिशत कमीशन नहीं देने के कारण पूर्व प्राचार्य प्रो. सूर्यमणि सिंह को पद से हटाया गया और इसके बाद शासी निकाय को भंग कर दिया गया। प्राचार्य का दावा है कि इसी क्रम में 29 जुलाई 2025 को सत्र 2025-29 के लिए विज्ञान संकाय का अस्थायी संबंधन भी अस्वीकृत कर दिया गया।
उन्होंने कहा कि कॉलेज का 19 मई 2025 को NAAC मूल्यांकन हुआ था, जिसमें कॉलेज को ‘C’ ग्रेड प्राप्त हुआ। प्राचार्य के अनुसार, कॉलेज ने विज्ञान संकाय की लाइब्रेरी और प्रयोगशाला से जुड़ी कमियों को दूर किया था। इसके बावजूद संबंधन नहीं दिया जाना समझ से परे है।
नामांकन रोकने से विद्यार्थियों पर असर का दावा
प्राचार्य ने कहा कि पलामू पिछड़ा क्षेत्र है और ए.के. सिंह कॉलेज में बड़ी संख्या में गरीब परिवारों के विद्यार्थी पढ़ते हैं। विज्ञान संकाय में नामांकन पर रोक लगने से बच्चे पड़ोस के निजी विश्वविद्यालयों की ओर पलायन कर रहे हैं, जिससे NPU को राजस्व की भी हानि हो रही है।
उनका कहना है कि कॉलेज में विज्ञान संकाय 2011 से संचालित है और 2013 से हर साल अस्थायी संबंधन दीर्घीकरण मिलता रहा, जबकि तब पुस्तकालय और प्रयोगशाला समृद्ध नहीं थे। लेकिन जब NAAC मूल्यांकन के दौरान कॉलेज ने शिक्षक को छोड़कर लाइब्रेरी और लैब की कमियां दूर कर लीं, तब पहली बार संबंधन देने से इंकार कर दिया गया। यह बदले की कार्रवाई है। इसी कारण 503 ऑफलाइन नामांकित विद्यार्थी सेमेस्टर-1 की परीक्षा से वंचित रह गए, बाद में छात्रों के आंदोलन की धमकी के बाद ही कुलपति ने फॉर्म भरवाना शुरू किया।
प्राचार्य ने आरोप लगाया कि सत्र 2026-30 के लिए भी विज्ञान संकाय का संबंधन अस्वीकृत कर दिया गया। इससे संबंधित पत्र कुलसचिव द्वारा 21.02.2026 को निर्गत किया गया, पर यह प्राचार्य को कभी भेजा ही नहीं गया। प्रतिलिपि निदेशक, उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग, झारखंड को भी भेजी जानी थी, पर वहां भी नहीं भेजी गई। विश्वविद्यालय प्रशासन ने साजिशन पत्र को छिपाया। यहां तक कि 12.06.2026 को सभी संबद्ध डिग्री कॉलेजों के प्राचार्यों की मीटिंग में भी इस बारे में कुछ नहीं बताया गया, जबकि मीटिंग 2026-30 में नामांकन को लेकर ही थी।
प्राचार्य का आरोप है कि कुलपति ने शिक्षक कमी के झूठे बहाने से नामांकन रोका है। जबकि NPU के सभी सरकारी एवं संबद्ध कॉलेजों में शिक्षकों की भारी कमी है, विशेषकर विज्ञान में। इसके बावजूद तुलनात्मक रूप से ए.के. सिंह कॉलेज में विज्ञान के शिक्षक ज्यादा हैं।उन्होंने उदाहरण दिया कि डिग्री कॉलेज, हुसैनाबाद (झरहा) में प्रभारी प्राचार्य सहित कुल 4 शिक्षक हैं, जिसमें मात्र 2 सहायक प्राध्यापक हैं, फिर भी वहां 900 नामांकन ले लिया गया, जबकि सरकार ने शिक्षक-छात्र अनुपात 1:60 निर्धारित किया है।
प्राचार्य ने गुलाबचंद प्रसाद अग्रवाल कॉलेज, छत्तरपुर के प्रति पक्षपात का आरोप लगाते हुए कहा कि वहां वेबसाइट के अनुसार मात्र 12 शिक्षक हैं, जबकि ए.के. सिंह कॉलेज में 27 शिक्षक हैं। कुलपति सिर्फ जंतु विज्ञान में 1 शिक्षक और 1000 छात्र का हवाला देकर हौवा खड़ा करते हैं, जबकि गुलाबचंद में बिना शिक्षक के ही जंतु विज्ञान में 800 छात्र नामांकित थे।
प्राचार्य के अनुसार, गुलाबचंद ने मात्र परास्नातक उत्तीर्ण 10 ऐसे शिक्षकों की सूची दी जिनको बैंक के माध्यम से वेतन नहीं दिया जाता यानी जो कागजी हैं, उसे कुलपति ने चुपचाप स्वीकार कर लिया। लेकिन ए.के. सिंह कॉलेज ने जब Ph.D उत्तीर्ण 6 नवनियुक्त शिक्षकों की सूची दी तो कुलपति रोज नई शर्तें रखने लगे - पहले विशेषज्ञ से सत्यापन, फिर योगदान पत्र, फिर मोबाइल नंबर और आधार नंबर।
प्राचार्य ने कहा, रसायनशास्त्र और गणित में शुरू से ही 3-3 शिक्षक हैं, पर कुलपति इसकी चर्चा तक नहीं करते। सिर्फ जंतु विज्ञान के नाम पर उच्चाधिकारी एवं मीडिया को गुमराह करते हैं। दरअसल कुलपति सिर्फ एक भाषा समझते हैं और वह है - नगद नारायण। चाहे जो हो जाए, मैं कुलपति को फूटी कौड़ी भी नहीं दूंगा। अब न्याय के लिए मेरा भरोसा सिर्फ महामहिम, मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री जी पर है।यह खबर प्राचार्य डॉ. राम सुभग सिंह द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति और उनके द्वारा महामहिम राज्यपाल, मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री को भेजे गए पत्र में लगाए गए आरोपों पर आधारित है। इस संबंध में विश्वविद्यालय पक्ष का जवाब आना शेष है।






