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सिर से पिता का साया उठा, तो बेटे की पढ़ाई के लिए आगे आया निजी स्कूल


रांची एक्सप्रेस संवाददाता बगोदर 

गिरिडीह जिले के बगोदर प्रखंड के तिरला गांव में इन दिनों मातम पसरा है। जिस घर में कभी हंसी-खुशी गूंजती थी, वहां अब सिर्फ सिसकियां सुनाई देती हैं।
परिवार का भरण-पोषण करने के लिए लालचंद महतो दुबई गए थे, जहां उन्हें कारपेंटर का काम मिला। लेकिन बीजा (वीजा) गुम हो जाने के बाद उनका काम छूट गया। हालात ऐसे बने कि उन्हें बेहद कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताना पड़ा और अंततः एक दिन पेड़ के नीचे उनका शव मिला।
सबसे दर्दनाक बात यह है कि आज भी उनका पार्थिव शरीर भारत नहीं पहुंच सका है। पत्नी की आंखें हर पल अपने पति के अंतिम दर्शन की राह देख रही हैं। वह कुछ कहना चाहती हैं, लेकिन आंसू शब्दों से पहले बह निकलते हैं। उनकी बस एक ही गुहार है—"सरकार, मेरे पति का शव भारत लाने की व्यवस्था कर दीजिए, ताकि हम उनका आखिरी बार चेहरा देख सकें।"पिता के साये के बिना बेटा और बेटी का भविष्य भी अनिश्चित हो गया है। ऐसे कठिन समय में एक निजी विद्यालय ने मानवीय संवेदनशीलता का परिचय देते हुए बेटे की पढ़ाई की जिम्मेदारी उठाई है। यह पहल निश्चित रूप से सराहनीय है, लेकिन एक पत्नी का दर्द और बच्चों के सिर से उठे पिता के साये की कमी कोई नहीं भर सकता। बताया जाता है कि 15 वर्ष पूर्व लालचंद महतो के पिता मुंबई रोजी-रोटी के तलाश में गए थे लेकिन आज तक उनके पिता भी घर वापस नहीं आया है उनकी माता आज भी राह देख रही है कि पति कहीं से घूमते फिरते घर वापस आ जाए लेकिन उसकी राह और कठिन बन गई है जब मां की आंखें थम गई तब बेटे विदेश कमाने के लिए निकला था लेकिन अब वह भी वापस नहीं आया अब उनकी राह पार्थिव शरीर पर नजर गदाई हुई है कि कब बेटे का सब अंतिम दर्शन को देख सके यही नहीं लालचंद महतो के एक बेटे और एक छोटी बेटी भी है उन्होंने भी अब सरकार से गुहार लगा रही है कि पिता का उत्सव पैतृक गांव लाया जाए

यह घटना प्रवासी मजदूरों की कठिन जिंदगी और उनके परिवारों की पीड़ा को एक बार फिर सामने लाती है।