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ग़ज़ल के जरिए तृषा को भावभीनी श्रद्धांजलि, मां दीपिका के अटूट प्रेम और पीड़ा को मिली अभिव्यक्ति


भावभीनी श्रद्धांजलि 🙏 
ग़ज़ल का केंद्र माँ दीपिका और बेटी तृषा के उस पवित्र, अटूट रिश्ते को रखा है—जहाँ बेटी के चले जाने के बाद माँ के पास यादें, ख़ामोशी और दुआएँ ही रह जाती हैं। 
तृषा की याद में — माँ की ख़ामोशी को सलाम
-- हृदयानंद मिश्र 
न लगाव अब रहा बाक़ी, न कोई आरज़ू है,
तेरे जाने के बाद माँ के दिल में ख़ामोशी है।
वो रिश्ता क्या था माँ-बेटी का, कौन लिख पाएगा,
एक धड़कन थी तृषा, एक धड़कन दीपिका की है।
माँ की आँखों में अभी तक वही चेहरा ज़िंदा,
बेटी दूर है मगर साँसों में उसकी मौजूदगी है।
जिसे सीने से लगाकर हर दुख से बचाया था,
आज उसी बेटी की याद ही माँ की ज़िंदगी है।
माँ ने माँगा था जिसे उम्र की हर दुआ में,
आज उस नाम की हर साँस में बस नमी है।
न कोई शिकवा है मौत से, न वक़्त से शिकायत,
जो मुक़द्दर में लिखा था, वही रब की मर्ज़ी है।
तृषा चली गई, मगर माँ से कहाँ दूर हुई,
माँ की ख़ामोश दुआओं में वही रोशनी है।
कभी आँगन में खिली थी वो हँसी बनकर जैसे,
आज उसी आँगन में यादों की चाँदनी है।
एक माँ अपनी बेटी को कहाँ खो पाती है,
जिस्म जाता है मगर रूह तो रिश्तों में बसी है।
अब न आवाज़ है उसकी, न कदमों की आहट,
घर की दीवारों से आती हुई बस ख़ामोशी है।
वक़्त मरहम भी लगाए तो भला कैसे लगाए,
माँ के ज़ख़्मों की दवा सिर्फ़ दुआ और बंदगी है।
ऐ ख़ुदा! तृषा को अपनी रहमतों में जगह देना,
माँ की आँखों की हर बूँद तेरे दर की बंदगी है।
हमें मालूम है लौटकर नहीं आएगी तृषा,
फिर भी हर मोड़ पर लगता है—वो यहीं कहीं है।
न लगाव, न उम्मीद, न कोई गिला अब,
तृषा के बाद बस माँ के दिल में ख़ामोशी है।
माँ-बेटी का ये रिश्ता कभी मरता नहीं 'हृदय',
एक जाती है तो दूसरी की साँसों में ज़िंदा रहती है।
— हृदयानंद मिश्र ,एडवोकेट ।