BREAKING NEWS

logo

पेयजल को तरस रहे देवघर के स्कूली बच्चे, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद नहीं हुई व्यवस्था


■ नया चितकाठ, बाराटांड़ समेत दर्जनों स्कूलों में नल सूखे, मुखिया से विधायक तक लगाई गुहार

रांची एक्सप्रेस ब्यूरो 

देवघर : सरकारी योजनाओं और "जल-जीवन-हरियाली" के बड़े-बड़े दावों के बीच देवघर जिले के सरकारी स्कूलों में आज भी बच्चे एक घूंट पानी के लिए तरस रहे हैं। 

मोहनपुर प्रखंड के उत्क्रमित मध्य विद्यालय नया चितकाठ और करौं प्रखंड के नव प्राथमिक विद्यालय बाराटांड़ की तस्वीरें सिस्टम की लापरवाही का जीता-जागता सबूत हैं।

तस्वीर में विद्यालय के गेट पर खड़े दर्जनों छात्र-छात्राएं और शिक्षिकाएं बेबस नजर आ रही हैं। स्कूल का बोर्ड चमक रहा है, लेकिन अंदर नल सूखे पड़े हैं। 

नया चितकाठ में बच्चे 4-5 घंटे बिना पानी के पढ़ने को मजबूर हैं। प्यास लगने पर घर से बोतल लाते हैं या बिना पानी के ही दिन गुजार देते हैं। शिक्षकों का कहना है कई बार गर्मी में बच्चे चक्कर खाकर गिर चुके हैं।

वहीं दूसरी ओर करौं प्रखंड के बाराटांड़ स्कूल की स्थिति भी इससे अलग नहीं। यहां भी मध्याह्न भोजन बनाने के लिए शिक्षकों को पड़ोस के घरों से पानी मांगना पड़ता है।

यह मामला सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि कानून के उल्लंघन का भी है।

1. सुप्रीम कोर्ट 2017 - “देश के सभी सरकारी स्कूलों में छात्रों के लिए सुरक्षित पेयजल और स्वच्छ शौचालय की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। यह बच्चों के मौलिक अधिकार ‘जीवन का अधिकार - अनुच्छेद 21’ से जुड़ा है।”

2. शिक्षा का अधिकार अधिनियम- 2009, धारा-19 के तहत हर मान्यता प्राप्त स्कूल में छात्र-छात्राओं के लिए पर्याप्त पेयजल की सुविधा अनिवार्य है।  

3. झारखंड शिक्षा विभाग के नियम:- हर स्कूल में चापानल/टंकी और पेयजल की व्यवस्था का स्पष्ट प्रावधान है।

इन सभी नियमों के बावजूद नया चितकाठ, बाराटांड़ समेत जिले के कई स्कूलों में आज तक पेयजल की पक्की व्यवस्था नहीं हो सकी है।
 
प्राप्त जानकारी के अनुसार ग्रामीणों और विद्यालय प्रबंधन ने कई बार मुखिया, जिला परिषद अध्यक्ष और स्थानीय विधायक को लिखित आवेदन दिए। आश्वासन मिले, निरीक्षण हुए, लेकिन धरातल पर शून्य।

नया चितकाठ की एक शिक्षिका ने नाम न छापने की शर्त पर कहा "हम बच्चों को कैसे पढ़ाएं, जब वे प्यासे तड़पते नजर आ रहे हों।सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी यहां सिर्फ कागजों तक ही सिमट कर रह गया है।

सूत्रों की मानें तो देवघर जिले के लगभग 30% से अधिक सरकारी स्कूलों में या तो चापानल खराब हैं या पानी की कोई वैकल्पिक व्यवस्था ही नहीं है। बरसात में दिक्कत कम होती है, लेकिन गर्मी आते ही समस्या विकराल हो जाती है।

वहीं दूसरी ओर ग्रामीणों में इस बात को लेकर नेताओं के प्रति गुस्सा है। ग्रामीणों का कहना है कि "नेता वोट मांगने आते हैं तो 'हर घर नल' का वादा करते हैं। लेकिन जब बच्चों को स्कूल में पानी चाहिए तो कोई सुनने वाला नहीं।"

अभिभावकों, शिक्षकों और सामाजिक संगठनों ने डीसी सौरभ भुवानियां देवघर और डीईओ/डीएसई से मांग की है कि आरटीई अधिनियम और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अनुपालन करते हुए अविलंब सभी स्कूलों में चापानल मरम्मत और वैकल्पिक पेयजल व्यवस्था की जाए।

अब लाख टके का सवाल तो यह है कि जब देश की 'सर्वोच्च अदालत' ने कह दिया कि स्कूल में पानी देना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है, तो फिर देवघर जिले के स्कूली बच्चों को पेयजल के लिए और कितने दिनों तक इंतजार करना पड़ेगा?

डीएसई मधुकर कुमार ने कहा:-
इन बाबत जिला शिक्षा अधीक्षक 'मधुकर कुमार' ने कहा कि संबंधित प्रखंडों के बीडीओ से बात कर 'नल जल योजना' या किसी और योजना के तहत हर हाल में जिले के सभी विद्यालयों में पेयजलापूर्ति सुनिश्चित करायी जाएगी।