शिव बारात में भी इनकी रहती है महत्वपूर्ण भूमिका
देवघर : कला के पुजारी हैं "पुटरूजी "
रांची एक्सप्रेस संवाददाता
बैद्यनाथधाम (देवघर) : बाबा नगरी देवघर में अगर श्रावणी मेले की बात हो या शिवरात्रि महोत्सव की। कला के पुजारी स्थानीय पुरोहित समाज के मार्कण्डेय जजवाड़े उर्फ पूटरु जी की चर्चा लोगो की जुबां पर आ ही जाता है। इस बीच खासकर शिव बारात का जिक्र न हो तो बात अधूरी लगती है। शिव बारात में "मार्कण्डेय जजवाडे उर्फ पुटरू जी" की कलाकृतियों के बिना शिव बारात की कल्पना नहीं कि जा सकती।
आज पुटरू जी देवघर में शिल्प कला का पर्याय बन चुके हैं। लकड़ी, थर्मोकोल, फाइबर और मिट्टी से वो जो रूप गढ़ते हैं, उसमें देवता जीवंत हो उठते हैं।
पुटरू जी खासियत ये है कि वे स्वयं कलाकृति को अपने हाथों से अंतिम रूप देते हैं। ऊनकी कारीगरी देखकर लगता है कि कला उनके खून में है।
पुटरू जी पिछले कई दशकों से देवघर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को अपनी कला से संवार रहे हैं। उनकी बनाई झांकियां, मूर्तियां और बारात के दृश्य न सिर्फ देवघर बल्कि आसपास के जिलों में भी प्रसिद्ध हैं।
महाशिवरात्रि पर बाबा बैद्यनाथ धाम से निकलने वाली भव्य शिव बारात देवघर की शान है। इस बारात की सबसे बड़ी खूबी होती है पुटरू जी द्वारा बनाई गई झांकियां। शिव-पार्वती विवाह, देव-देवताओं की सवारी, पौराणिक प्रसंग - सब कुछ लकड़ी और अन्य सामग्री से इतनी जीवंतता से बनाते हैं कि देखने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि "शिवरात्रि हो या कोई मेला, पूजा या शोभायात्रा, पुटरू जी के बिना देवघर का कोई आयोजन पूरा नहीं होता।"
पुटरू जी ने न केवल खुद शिल्प कला को जिंदा रखा, बल्कि दर्जनों युवाओं को भी यह हुनर सिखाया। उनका मानना है कि कला बेचने की चीज नहीं, ये आस्था और संस्कृति को बचाने का जरिया है।
आज 60+ की उम्र में भी वो उसी जोश से काम करते हैं। सुबह से रात तक कार्यशाला में लकड़ी तराशते रहते हैं। उनका सपना है कि देवघर की शिल्प कला को राष्ट्रीय पहचान मिले और आने वाली पीढ़ी इसे आगे बढ़ाए।
मार्कण्डेय जजवाडे उर्फ पुटरू जी सिर्फ एक मूर्तिकार नहीं हैं। वो देवघर की परंपरा, आस्था और पहचान के संरक्षक हैं। उनकी उंगलियों से निकली हर मूर्ति में बाबा नगरी की आत्मा बसती है। इसीलिए कहा जाता है, "देवघर में कोई भी बड़ा आयोजन हो, पुटरू जी के बिना अधूरा है।"





